राजस्थान हाईकोर्ट लंबे समय से जयपुर के सिविक अधिकारियों से प्रताप नगर सेक्टर 5 की सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने को कह रहा है। 7 सितंबर 2026 को न्यायाधीश इंद्रजीत सिंह और न्यायाधीश संदीप तनेजा की खंडपीठ ने आखिरकार राज्य के शीर्ष अधिकारियों को यह बताने के लिए तलब किया कि अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ। नगरीय विकास एवं आवासन विभाग (यूडीएच) के प्रमुख सचिव, हाउसिंग बोर्ड सचिव, जेडीए सचिव और नगर निगम आयुक्त — सभी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए बुलाया गया।
अदालत के समक्ष याचिका के अनुसार, इस सरकारी जमीन पर करीब 145 अतिक्रमण लगभग 25 साल से खड़े हैं, और इस बीच कब्जाधारियों को सड़क, सीवरेज और अन्य सुविधा कनेक्शन तक मिल चुके हैं — यानी जितना अधिक समय बीता, अवैध कब्जा उतना ही सामान्य होता गया। अदालत ने सबसे पहले 22 अप्रैल 2022 को अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था, और अधिकारियों को कार्रवाई के लिए चार महीने का समय दिया था। 24 जुलाई की एक बैठक में यह स्वीकार किया गया कि अतिक्रमण मौजूद हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताया गया कि सुविधाएँ पहले से जुड़ी हैं, और प्रशासन ने इसके बजाय एक "सिटी डवलपमेंट स्कीम" के तहत कब्जे को नियमित करने की माँग की। खंडपीठ ने इस माँग को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। इसके बावजूद, सितंबर 2026 तक ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं हुई थी।
अदालत में सुनवाई से पहले 3 सितंबर की बैठक में प्रमुख सचिव (यूडीएच) ने कथित तौर पर प्रस्ताव रखा कि हाउसिंग बोर्ड और नगर निगम मिलकर अतिक्रमण हटाएँ, और इसके लिए अदालत से तीन महीने का समय माँगा। खंडपीठ ने इस पर सीधा सवाल उठाया: "जब अतिक्रमण स्थापित हो चुका है और हाईकोर्ट ने कार्रवाई का आदेश दिया है, तो इसे हटाया क्यों नहीं जा रहा?" अदालत ने नगर आयुक्त के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि निगम की इस जमीन के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती। माँगे गए तीन महीने के बजाय, अदालत ने ज़मीनी हालात पर रिपोर्ट देने के लिए 16 नवंबर 2026 की छोटी समय-सीमा तय की।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। यही खंडपीठ शहर में अन्य जगहों पर भी जेडीए की इसी तरह की प्रवर्तन-कमी पर सख्ती बरत रही है — 22 गोदाम रेलवे स्टेशन से बी-2 बाइपास तक फैले हिस्से से करीब 310 अतिक्रमण तीन महीने के भीतर हटाने का आदेश भी दिया गया है, जिसकी अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को तय है। इन सभी को मिलाकर देखें तो यह पैटर्न सामने आता है कि सालों से हटाने के आदेश जारी होते रहे, लेकिन लागू नहीं हुए, जबकि सार्वजनिक भूमि पर कब्जा ज़मीन पर धीरे-धीरे स्थायी जैसा दिखने लगा।
प्रताप नगर सेक्टर 5 के आस-पास के निवासियों और पूरे शहर के लिए, लागू न हुआ हटाने का आदेश कोई तटस्थ परिणाम नहीं है — इसका मतलब है कि सार्वजनिक उपयोग के लिए तय सरकारी जमीन अनिश्चित काल तक पहुँच से बाहर रहती है, और यह मिसाल कायम होती है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करके सिर्फ कागज़ी कार्रवाई से आगे निकल जाने भर से फायदा मिल सकता है। इस पट्टी के आस-पास कोई जमीन या संपत्ति देख रहे किसी भी व्यक्ति के लिए, लंबित मुकदमा और न हटने का लंबा इतिहास यह वजह है कि मामला किसी भी दिशा में तय मान लेने के बजाय मौजूदा स्थिति ध्यान से जाँची जाए। लेखन के समय तक 16 नवंबर से आगे की किसी मुआवज़ा योजना, पुनर्वास व्यवस्था या नई समय-सीमा की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी।
यदि आपको अपने क्षेत्र में सरकारी जमीन पर लंबे समय से चला आ रहा अतिक्रमण दिखे, या कोई हटाने का आदेश पारित हुआ हो पर कभी लागू न हुआ हो, तो आप इसे जेडीए के जन शिकायत माध्यम से या सीधे यूडीएच विभाग को लिखकर उठा सकते हैं — सर्वे नंबर के साथ दर्ज की गई शिकायत ही अंततः स्थिति रिपोर्ट के लिए दबाव बनाती है। हक़दार इस मामले पर नज़र रखेगा और 16 नवंबर की पालना रिपोर्ट दाखिल होने पर आगे की जानकारी देगा।